volume oscillator indicator

Volume Oscillator Indicator

Intro
शेयर मार्केट और ट्रेडिंग में अगर आप यह जानना चाहते हैं कि किसी स्टॉक में असली ताकत है या नहीं, तो वॉल्यूम को समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है। Volume Oscillator Indicator इसी काम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह इंडिकेटर प्राइस मूवमेंट के पीछे छुपी खरीद–बिक्री की ताकत को दिखाता है, जिससे फेक ब्रेकआउट और कमजोर ट्रेंड से बचा जा सकता है। 


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Volume Oscillator Indicator क्या है

Volume Oscillator एक टेक्निकल इंडिकेटर है जो दो अलग-अलग अवधि के वॉल्यूम मूविंग एवरेज के बीच का अंतर दिखाता है। आसान भाषा में, यह बताता है कि हाल का वॉल्यूम पुराने वॉल्यूम की तुलना में बढ़ रहा है या घट रहा है। जब वॉल्यूम बढ़ता है और प्राइस उसी दिशा में चलता है, तब ट्रेंड ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।


Volume Oscillator कैसे काम करता है

इस इंडिकेटर में एक Short-Term Volume Average और एक Long-Term Volume Average लिया जाता है। दोनों के बीच का अंतर प्रतिशत या वैल्यू के रूप में दिखाया जाता है।
अगर शॉर्ट-टर्म वॉल्यूम, लॉन्ग-टर्म वॉल्यूम से ज्यादा है, तो ऑस्सीलेटर पॉजिटिव ज़ोन में चला जाता है। इसका मतलब है कि मार्केट में एक्टिविटी बढ़ रही है। इसके उलट, नेगेटिव ज़ोन घटती हुई रुचि को दिखाता है।


Volume Oscillator का Formula (Simple समझें)

Volume Oscillator =
(Short Term Volume MA – Long Term Volume MA) / Long Term Volume MA × 100

इस फॉर्मूले का मकसद सिर्फ यह मापना है कि नया वॉल्यूम कितना मजबूत या कमजोर है।

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Trading में Volume Oscillator का उपयोग

ट्रेडर इस इंडिकेटर का इस्तेमाल ट्रेंड कन्फर्मेशन के लिए करते हैं। अगर प्राइस ऊपर जा रहा है और Volume Oscillator भी ऊपर है, तो अपट्रेंड मजबूत माना जाता है।
अगर प्राइस तो ऊपर जा रहा है लेकिन Volume Oscillator नीचे है, तो यह एक वार्निंग सिग्नल हो सकता है कि ट्रेंड कमजोर है।


Buy Signal कैसे पहचानें

जब Volume Oscillator नेगेटिव ज़ोन से निकलकर पॉजिटिव ज़ोन में आता है और उसी समय प्राइस भी सपोर्ट से ऊपर उठता है, तो यह एक अच्छा बाय सिग्नल बन सकता है। इसका मतलब है कि खरीदारी में नई ताकत आ रही है।

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Sell Signal कैसे पहचानें

अगर Volume Oscillator पॉजिटिव ज़ोन से नीचे गिरने लगे और प्राइस रेजिस्टेंस के पास कमजोर दिखे, तो यह सेल या एग्ज़िट का संकेत हो सकता है। यहाँ वॉल्यूम का गिरना बताता है कि खरीदार अब पीछे हट रहे हैं।


Volume Oscillator और Price Divergence

डाइवर्जेंस इस इंडिकेटर का एक बहुत अहम उपयोग है।
जब प्राइस नई हाई बनाए लेकिन Volume Oscillator नई हाई न बनाए, तो इसे Bearish Divergence कहा जाता है। यह अक्सर ट्रेंड रिवर्सल से पहले दिखता है।
इसी तरह, प्राइस नई लो बनाए लेकिन Volume Oscillator ऊपर जाने लगे, तो Bullish Divergence बनती है।

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किस टाइमफ्रेम में बेहतर काम करता है

Volume Oscillator हर टाइमफ्रेम में काम करता है, लेकिन डे ट्रेडिंग और स्विंग ट्रेडिंग में यह ज्यादा उपयोगी माना जाता है। छोटे टाइमफ्रेम में नॉइज़ ज्यादा होता है, इसलिए इसे प्राइस एक्शन और सपोर्ट-रेज़िस्टेंस के साथ देखना ज़रूरी है।


Volume Oscillator की Limitations

यह इंडिकेटर अकेले इस्तेमाल करने पर गलत सिग्नल भी दे सकता है। कई बार न्यूज़ या इवेंट के कारण अचानक वॉल्यूम बढ़ जाता है, जिससे फेक सिग्नल बन सकता है। इसलिए इसे RSI, Moving Average या ट्रेंडलाइन जैसे दूसरे टूल्स के साथ कन्फर्म करना बेहतर होता है।


Beginners के लिए Best Tips

Volume Oscillator को हमेशा प्राइस के साथ पढ़ें, सिर्फ लाइन देखकर फैसला न लें।
पहले चार्ट पर सपोर्ट-रेज़िस्टेंस और ट्रेंड पहचानें, फिर वॉल्यूम ऑस्सीलेटर से कन्फर्मेशन लें।
डेमो या पेपर ट्रेडिंग में प्रैक्टिस करके ही रियल ट्रेड में इस्तेमाल करें।


Conclusion

Volume Oscillator Indicator ट्रेडिंग में वॉल्यूम की ताकत समझने का एक बेहतरीन टूल है। यह आपको यह जानने में मदद करता है कि प्राइस मूवमेंट के पीछे असली खरीद–बिक्री है या नहीं। सही तरीके से और दूसरे इंडिकेटर्स के साथ इस्तेमाल करने पर यह आपके ट्रेडिंग डिसीजन को काफी मजबूत बना सकता है।

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